अफ़ग़ानिस्तान संकटः 9/11 हमले के बाद ये पाँच ज़रूरी सबक़ दुनिया ने सीखे या नहीं?

दुनिया भर में चरमपंथियों से लड़ने के 20 सालों के दौरान क्या कोई सबक सीखा गया है? कौन सा उपाय काम किया और कौन सा नहीं?

और आज अल-क़ायदा को पनाह देने वाला तालिबान जब एक बार फिर अफ़ग़ानिस्तान में सत्ता में वापस आ चुका है तो 11 सितंबर 2001 की सुबह की उस घटना की तुलना में क्या हम आज ज़्यादा समझदार हो चुके हैं?

वो घटना जब अमेरिका अपने अब तक के सबसे भीषण आतंकी हमले से जूझ रहा था, तब लड़ाई अच्छे लोग बनाम बुरे लोग की थी.

9/11 हमले के 9वें दिन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने दुनिया के सभी मुल्कों को संबोधित करते हुए कहा था, “हर देश, हर क्षेत्र को अब एक निर्णय लेना है. या तो आप हमारे साथ हैं या आप आतंकवादियों के साथ हैं.”

इस तरह तथाकथित “आतंकवाद के ख़िलाफ़ युद्ध” की घोषणा की गई.

इसके बाद अफ़ग़ानिस्तान और फिर इराक़ पर हमला, इस्लामिक स्टेट का उदय और मध्यपूर्व में ईरान के समर्थन वाले मिलिशिया का प्रसार और हज़ारों सैनिकों, महिलाओं और आम नागरिकों की मौत हुई.

लेकिन आतंकवाद का सफ़ाया नहीं हुआ. हाल के वर्षों में हर बड़े यूरोपीय देश पर हमले हुए हैं.

हालांकि कुछ सफलताएं भी मिली हैं.

तब से आज की तारीख़ तक 9/11 के जैसे बड़े पैमाने पर कोई आतंकवादी हमला नहीं हुआ. अफ़ग़ानिस्तान से अल-क़ायदा का सफ़ाया हो गया है, उसके सरगना को पाकिस्तान में मार गिराया गया.

स्वघोषित आईएसआईएस ‘ख़िलाफ़त’ जिसने सीरिया और इराक़ में आतंक फ़ैलाया था, उसे नष्ट कर दिया गया है.

मैंने नीचे जो ये लिस्ट बनाई है वो निस्संदेह विवादास्पद हो सकती है. यह मध्यपूर्व, अफ़ग़ानिस्तान, अमेरिका और ग्वांतानामो बे में इस विषय को कवर करने की मेरी अपनी जांच पड़ताल पर आधारित है.

1. अहम ख़ुफ़िया जानकारी साझा करना

तब संकेत तो थे लेकिन किसी ने समय पर उन बिंदुओं को जोड़कर नहीं समझा. 9/11 से पहले के महीनों में, अमेरिका के दो मुख्य ख़ुफ़िया विभागों, एफ़बीआई और सीआईए को यह बात पता थी कि कोई साजिश रची जा रही है.

लेकिन घरेलू और विदेशी ख़ुफ़िया जानकारी इकट्ठा करने वालों के बीच ऐसी होड़ थी कि जो वो जानते थे उसे अपने पास ही रखते थे. बाद में 9/11 आयोग की रिपोर्ट में ग़लतियों की विस्तृत छानबीन की गई और बड़े सुधार किए गए हैं.

जब 2006 में मैं वर्जीनिया स्थित अमेरिकी राष्ट्रीय आतंकवाद निरोधी केंद्र (एनसीटीसी) गया तो मुझे दिखाया गया कि कैसे अब 17 अमेरिकी एजेंसियां रोज़ अपनी ख़ुफ़िया जानकारियां साझा करती हैं.

ब्रिटेन ने भी अपना ऐसा ही फ़्यूजन सेंटर बनाया हैः द जॉइंट टेररिज़्म एनालिसिस सेंटर (जेटीएसी) जहां एमआई5, एमआई6, डिफेंस, ट्रांसपोर्ट, हेल्थ और अन्य क्षेत्रों के दर्जनों विशेषज्ञ लंदन की एक इमारत में साथ बैठते हैं और उनका काम है देश-विदेश में ब्रिटिश नागरिकों के ख़िलाफ़ आतंकी ख़तरे का लगातार मूल्यांकन करना.2017 की बमबारी पर शोक मनाता मैनचेस्टर शहर

लेकिन यह व्यवस्था एकदम सटीक नहीं है. क्योंकि जेटीएसी की स्थापना के दो साल बाद अल-क़ायदा 7 जुलाई 2005 को लंदन में बम धमाका करने में कामयाब रहा. इसके लिए उसने ब्रिटिश नागरिक का ही इस्तेमाल किया था. उस हमले में 50 से अधिक लोगों की मौत हो गई थी.

इसके एक साल बाद पाकिस्तान की मदद से हवा में उड़ान के दौड़ान कई विमानों को उड़ाने की साज़िश को नाकाम किया गया लेकिन ब्रिटेन को 2017 में मैनचेस्टर बम धमाकों समेत कई हमलों का सामना करना पड़ा.

तो अगर किस काम को प्राथमिकता देनी है, इसे लेकर ग़लत फ़ैसले लिए जाते हैं तो अच्छी ख़ुफ़िया जानकारी प्राप्त करना और उसे साझा करने के बाद भी हम हमलों को रोक पाने में विफल हो सकते हैं.

पेरिस में 2015 के बटकलान हमले के मामले में आज भी मुक़दमा चल रहा है. तब उस हमले में 130 लोग मारे गए थे. यह कुछ हद तक यूरोपीय अधिकारियों के सीमा पार से समय पर ख़ुफ़िया जानकारी साझा करने में विफलता का परिणाम था.

2. बग़ैर भटके मूल मिशन स्पष्ट करना

अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के शासन की वापसी के कई कारणों में से एक है- 2003 में इराक़ पर अमेरिका के नेतृत्व में किया गया आक्रमण. तब लिए गए इस दुर्भाग्यपूर्ण फ़ैसले ने अफ़ग़ानिस्तान में जो कुछ भी चल रहा था उससे ध्यान भटका दिया. अल-क़ायदा के गुर्गों का सफलतापूर्वक शिकार कर रहे अमेरिका और ब्रिटेन के विशेष बल के उन कई सैनिकों को जो तालिबान विद्रोहियों को बैकफुट पर रखने के लिए अफ़ग़ान साझेदारों के साथ काम कर रहे थे, अफ़ग़ानिस्तान से हटा कर इराक़ भेज दिया गया.

इसकी वजह से तालिबान और अन्य समूहों को एक बार फिर संगठित होने और मजबूत बनकर वापसी का मौका मिल गया.

नवंबर 2003 तक, जब मैं अफ़ग़ानिस्तान के पक्तिका प्रांत में एक अमेरिकी सैन्य चौकी का दौरा कर रहा था तब वो (अमेरिकी) अपने मिशन को पहले से ही “ऑपरेशन फॉरगॉटन” बता रहे थे.

यह भूलना आसान है कि अफ़ग़ानिस्तान का पहला मिशन बिल्कुल स्पष्ट और अच्छी तरह से पूरा किया गया था. जब तालिबान ने अल-क़ायदा के सरगना को अमेरिका को सौंपने से इनकार कर दिया था तब अमेरिका ने नॉर्दर्न अलायंस (तालिबान का विरोध करने वाले अफ़ग़ान) के साथ मिलकर वहां से तालिबान और अल-क़ायदा दोनों को बाहर निकालने में सफलता पाई थी.

लेकिन बाद के वर्षों में वह मिशन कई दिशाओं में घूमते हुए फ़ीका पड़ गया.

उस दौरान अफ़ग़ानों के जीवन में काफ़ी सुधार हुआ, लेकिन “राष्ट्र निर्माण” में लगाए गए अरबों डॉलर भ्रष्टाचार और अधिक ख़र्च की वजह से गंवा दिए गए.

3. सहयोगियों का सावधानीपूर्वक चयन

2003 में इराक़ पर हमले के समय ब्रिटेन अमेरिका का सबसे क़रीबी सहयोगी था. इसका मतलब था कि बाद के क़ब्ज़े के दौरान अमेरिका के सभी फ़ैसलों में ब्रिटेन उसका जूनियर पार्टनर था.

इराक़ी सेना को भंग न करने या बाथ पार्टी के सभी सदस्यों को सरकारी भूमिकाओं से प्रतिबंधित करने जैसी उसकी अपील की अनदेखी की गई या उसे ख़ारिज कर दिया गया.

इसका परिणाम ये हुआ कि नए-नए बेरोज़गार बने असंतुष्ट इराक़ी सैनिकों और ख़ुफ़िया अधिकारियों के बीच एक विनाशकारी गठबंधन बन गया और यह आईएसआईएस बन गया.

9/11 की उस दहशत के बाद अमेरिका और ब्रिटेन के ख़ुफ़िया विभागों ने मानवाधिकार उल्लंघन के ख़राब रिकॉर्ड वाले कुछ शासनों के साथ सहयोग करना ख़त्म कर दिया था. तो उन्हें अपने किए के अप्रिय परिणाम का अनुभव करना पड़ा.

उदाहरण के लिए, जब 2011 में कर्नल गद्दाफ़ी के शासन को लीबिया में उखाड़ फेंका गया तो पत्रकारों को एमआई6 के वरिष्ठ अधिकारी से उनके लीबियाई समकक्ष का एक पत्र मिला जिसमें गिरफ़्तारी और दुर्व्यवहार का सामना करने के लिए एक इस्लामी असंतुष्ट के प्रत्यर्पण की चर्चा थी.

आज, वो “हिंसक जिहादी” अफ़्रीका के कमज़ोर शासन वाले हिस्सों और अनियंत्रित हिस्सों में सबसे अधिक पांव पसारने की कोशिश में लगे हैं और वहां किसके साथ भागीदारी करनी चाहिए, यह पश्चिम के लिए एक समस्या है.ग्वांतानामो बे के ख़िलाफ़ प्रदर्शन की एक फ़ाइल फ़ोटो

4. मानवाधिकारों का सम्मान करें

मध्यपूर्व में बार-बार लोगों ने मुझसे कहाः “भले ही हमें अमेरिकी विदेश नीति नापसंद हो लेकिन हम ग्वांतानामो बे से पहले तक उसके क़ानून के शासन का सम्मान करते थे.”

युद्धक्षेत्र में संदिग्धों को घेरना, जिसमें कुछ मामलों में निर्दोष नागरिक भी शामिल हैं जिन्हें इनाम पाने की लालच में बेच दिया गया था, और फिर उन्हें लंगोट, काले चश्मे और कान में मफ़लर लपेट कर आधी दुनिया पार करा क्यूबा के एक अमेरिकी नौसेना के यातना सेंटर ग्वांतानामो बे ले जाया जाता था. यह अमेरिका और पश्चिम की प्रतिष्ठा को हुई अपूरणीय क्षति है.

बिना मुक़दमे के क़ैद में रखना कुछ वैसा ही था जैसा किसी तानाशाह देशों में हुआ करता था. अरब के लोगों को अमेरिकियों से ये उम्मीद नहीं थी.

आगे इससे भी ख़राब बात तब हुई, सीआईए की इस जेल में जहां कई संदिग्ध आतंकवादी बस गायब ही हो गए. वहां से बढ़चढ़ कर की गई सख़्त पूछताछ, वाटरबोर्डिंग और अन्य दुर्व्यवहारों का खुलासा हुआ.

ओबामा प्रशासन ने इस पर रोक लगा दी लेकिन तब तक बड़ी क्षति पहुंच चुकी थी.अमेरिकी सेना ने 2001 में अफ़ग़ानिस्तान से अल-क़ायदा और तालिबान को तेज़ी से ख़त्म कर दिया था, तो यह युद्ध क्यों खिंचा?

5. एग्ज़िट प्लान का निर्धारित होना

9/11 से पहले पश्चिम के हस्तक्षेप तुलनात्मक रूप से बहुत फुर्तीले और सरल थे. सियरे लियोन, कोसोवो, यहां तक कि 1991 का डेज़र्ट स्टॉर्म अभियान, सब में एक नियत अंत था.

लेकिन अफ़ग़ानिस्तान और फिर इराक़ पर अमेरिका के नेतृत्व वाले आक्रमणों को “हमेशा चलते रहने वाला युद्ध” ही बताया गया.

2001 या 2003 में इस अनवरत युद्ध में शामिल होने वाले किसी ने भी यह नहीं सोचा था कि दो दशकों बाद भी वो वहीं रहेंगे.

सीधे शब्दों में कहा जाए तो पश्चिम को यह समझ नहीं आया कि वह क्या कर रहा है और उसके पास कोई एग्ज़िट प्लान ही नहीं था.

इसमें कोई संदेह नहीं है कि अगर पश्चिम ने 2001 में अफ़ग़ानिस्तान से तालिबान और अल-क़ायदा को नहीं खदेड़ा होता तो वहां से और हमले होते. उस देश में आतंकवाद निरोधी मिशन कभी असफल नहीं था लेकिन “राष्ट्र निर्माण” का कार्य कभी पूरा नहीं हुआ.

और आज, वहां कि जो एक स्थायी छवि लोग बनाएंगे वो है – यूएस एयरफोर्स की सी17 ट्रांसपोर्ट ग्लोबमास्टर एयरक्राफ़्ट के साथ प्रस्थान करते हताश अफ़ग़ान, जो अपने देश से भागने की कोशिश कर रहे हैं क्योंकि पश्चिम ने अब सब छोड़ दिया है.

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